IAS Success Story: पिता चलाते थे चाय की दुकान और बेटा पहले ही प्रयास में बना IAS ऑफिसर

Success Story Of IAS Topper Deshaldan Ratnu: यूपीएससी सीएसई परीक्षा को लेकर जो अनेक तरह की भ्रांतिया लोगों के मन में हैं उनमें एक मुख्य है कि कैंडिडेट के बैकग्राउंड और वातावरण का इस परीक्षा को पास करने में बहुत बड़ा रोल है. लेकिन जब राजस्थान के देशलदान रतनू के सफर पर नजर डालें तो पता चलता है कि न उन्हें पढ़ाई का माहौल मिला न सुविधाएं और न ही संसाधन लेकिन इन सब के बावजूद उन्होंने देश की सबसे कठिन परीक्षा देने का न केवल मन बनाया बल्कि पहले ही प्रयास में 82वीं रैंक के साथ टॉप भी किया. कोई सोच भी नहीं सकता कि एक लड़का जिसके घर में जरूरी चीजें मुहैया कराना भी उसके पिता के लिए मुश्किल था क्योंकि एक चाय की दुकान से घर का खर्च चलता था, वह एक दिन आईएएस अधिकारी बन जाएगा. दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में देशलदान ने विभिन्न मुद्दों पर बात की. जानते हैं विस्तार से.

यहां देखें देशलदान रतनू द्वारा दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिया गया इंटरव्यू –  

बड़े भाई से ली प्रेरणा –

देशल के घर में पैसों की कमी के कारण सभी भाई-बहन पढ़ाई न कर सके. केवल देशल और उनके एक बड़े भाई ने पढ़ाई की ओर रुख किया. पिताजी के पास जो थोड़े से खेत थे उनसे कुछ खास कमाई नहीं होती थी इसलिए उन्होंने टी-स्टॉल लगाना शुरू किया. देशल के बाकी भाई-बहन या तो इसी टी-स्टॉल पर काम करते थे या खेतों पर.

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देशल के घर का माहौल पढ़ायी वाला नहीं था पर बचपन में ही वे मन बना चुके थे कि अपनी पढ़ायी जारी रखेंगे और खेत या टी-स्टॉल पर काम नहीं करेंगे. इसमें देशल के बड़े भाई का भी बड़ा रोल रहा, जो इंडियन नेवी में थे. वे जब घर आया करते थे तो वहां की बहुत सी बातें देशल को बताया करते थे ओर देशल से कहते थे कि तुम या तो बड़े होकर इंडियन फोर्स में जाना या एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेस में. यहीं से देशल के मन में यूपीएससी परीक्षा की नींव पड़ी. हालांकि देशल उस वक्त टूट गये जब उनके बड़े भाई की ऑन ड्यूटी डेथ हो गयी. यह उनके लिये यह बहुत बड़ा इमोशनल लॉस था पर अपने भाई की कही बातें वे कभी नहीं भूले.

देशलदान का सफर –

बड़े भाई की मृत्यु के समय देशल क्लास दसवीं में थे. इस समय से ही वे पढ़ाई को लेकर बहुत गंभीर हो गए और दसवीं के बाद कोटा चले गए. यहीं से उन्होंने बारहवीं की. 12वीं के बाद देशल ने जेईई इंट्रेंस दिया और सेलेक्ट भी हो गए. उन्होंने आईआईटी जबलपुर से ग्रेजुएशन किया. स्नातक तो हो गया लेकिन अपने भाई की कही एडमिनिस्ट्रेटिव जॉब वाली बात उनके दिमाग से नहीं निकली. इसके साथ ही वे इतनी कठिनाइयों से यहां तक पहुंचे थे कि अपने जैसे दूसरे कैंडिडेट्स की मदद करना चाहते थे. इसके लिए भी उन्हें यूपीएससी एक बढ़िया जरिया लगा.

खैर देशल तैयारी के लिये दिल्ली चले गए पर उन्हें पता था कि उनके पास यूपीएससी की तैयारी के लिए न तो पैसे हैं न ही ज्यादा समय. वे जितना जल्दी हो सके यह परीक्षा पास कर लेना चाहते थे. हुआ भी यही और देशल ने बिना कोचिंग के पहली ही बार में 82वीं रैंक के साथ यूपीएससी परीक्षा पास की और अपने भाई का सपना पूरा करके ही दम लिया.

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क्या सीख देती है देशलदान की कहानी –

देशलदान के जीवन का संघर्ष कई बातों को साफ करता है. आपके घर में कोई पढ़ा-लिखा है या नहीं, आपके घर का माहौल कैसा है, आपकी स्कूलिंग कहां से हुई है ये सब बातें कभी सफलता के रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकती, अगर आप अपना 100 प्रतिशत देने के लिए तैयार हैं. देशलदान को देखकर यह यकीन सच में बदलता है कि ऐसे जीवन और इतने संघर्ष के बाद भी सफलता मिल सकती है. मात्र 24 साल की उम्र में देशल ने यूपीएससी 2017 की परीक्षा में टॉपर्स की सूची में अपनी जगह बनायी. यह सफलता बताती है कि जिसमें गुण होते हैं, वो कैसे भी माहौल में रहे पर अपनी खूबियों को नहीं खोता. उन्होंने शुरू से लेकर ऑफिसर बनने तक अपनी जिंदगी खुद चुनी. नतीजा यह हुआ कि एक बहुत ही साधारण परिवार का यह बेटा पहले ही प्रयास में देश की सबसे कठिन परीक्षा पासकर आईएएस अधिकारी बन गया.

 

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