IAS Success Story: एक छोटे से गांव से निकलकर विदेश पहुंचने वाली किसान की यह बिटिया ऐसे बनी UPSC टॉपर

Success Story Of IAS Topper Ilma Afroz: मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश में एक कस्बा है कुंदरकी. हमारी आज की टॉपर की जन्म और कर्म स्थली है यह कस्बा. इस छोटी सी जगह से निकली एक लड़की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क पहुंची और फिर यूपीएससी परीक्षा टॉप करके बनी आईपीएस ऑफिसर. जी हां, हम बात कर रहे हैं साल 2017 की टॉपर इल्मा अफरोज की, जिनकी जिंदगी का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता. उनके जीवन में बचपन से इतने संघर्ष आए और जिस हिम्मत से इल्मा ने इनका सामना किया वह काबिलेतारीफ है. लेकिन यह कहानी, कहानी न होकर इल्मा के वास्तविक संघर्ष थे. दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बात की. जानते हैं विस्तार से.

जब असमय हटा सिर से पिता का साया –  

इल्मा और उनके खुशहाल परिवार को नज़र तब लगी जब उनके पिता का असमय देहांत हो गया. उस समय इल्मा 14 वर्ष की थी और उनका भाई 12 साल का. घर के अकेले कमाने वाले सदस्य के न रहने से अचानक परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इल्मा की अम्मी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. लोगों ने सलाह दी कि लड़की को पढ़ाने में पैसे बर्बाद न करके इसकी शादी कर दें, बोझ कम हो जायेगा. इल्मा की अम्मी ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया पर की हमेशा अपने मन की.

इल्मा कक्षा एक से हमेशा अव्वल आती थी. ऐसे में उनका पढ़ायी के प्रति रुझान मां से छिपा नहीं था. उनकी मां ने दहेज के लिये पैसा इकट्ठा करने की जगह उस पैसे से बेटी को पढ़ाया. इल्मा भी पारिवारिक हालात से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थी इसलिये उन्होंने बहुत पहले से अपनी मेहनत के दम पर स्कॉलरशिप्स पाना शुरू कर दिया था. इल्मा की पूरी हायर स्टडीज़ स्कॉलरशिप्स के माध्यम से ही हुयी हैं.

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यहां देखें इल्मा अफरोज द्वारा दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिया गया इंटरव्यू –  

 

कुंदरकी से सेंट स्टीफेन्स तक का सफर –

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इल्मा अपने सेंट स्टीफेन्स में बिताये सालों को जीवन का श्रेष्ठ समय मानती हैं, जहां उन्होंने बहुत कुछ सीखा. हालांकि बेटी को दिल्ली भेजने के कारण उनकी मां ने खूब खरी-खोटी सुनी जैसे बेटी हाथ से निकल जायेगी, उसको पढ़ाकर क्या करना है वगैरह-वगैरह पर उन्हें अपनी बच्ची पर पूरा विश्वास था. सेंट स्टीफेन्स के बाद इल्मा को मास्टर्स के लिये ऑक्सफोर्ड जाने का अवसर मिला. अब तो गांव वालों और रिश्तेदारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और यहां तक डिक्लेयर कर दिया की लड़की गयी हाथ से, अब वापस नहीं आएगी. इल्मा की अम्मी ने अभी भी किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया.

यहां इल्मा की अम्मी इतनी बातें सुन रही थी, वहां इल्मा यूके में अपने पढ़ाई के अलावा बाकी खर्चें पूरे करने के लिये कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी, कभी छोटे बच्चों की देखभाल का काम करती थी. यहां तक कि लोगों के घर के बर्तन भी धोये.

ठुकराया विदेश में नौकरी का ऑफर –

विदेश में डिग्री पूरी करने के बाद इल्मा एक वॉलेंटियर प्रोग्राम में शामिल होने न्यूयॉर्क गयीं. यहां उन्हें बढ़िया नौकरी का ऑफर मिला. इल्मा चाहती तो यह ऑफर ले लेती और विदेश में ही बस जाती. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनके अब्बू ने उन्हें जड़ों से जुड़ना सिखाया था. इल्मा कहती हैं कि मुझ पर, मेरी शिक्षा पर पहले मेरे देश का हक है, मेरी अम्मी का हक है. अपनों को छोड़कर मैं क्यों किसी और देश में बसूं?

न्यूयॉर्क से वापस आने के बाद इल्मा के मन में यूपीएससी का ख्याल आया. उनके भाई ने उन्हें इसके लिये प्रेरित किया. इल्मा कहती हैं, जब वे गांव वापस आती थी तो गांव के लोगों की आंखों में एक अलग ही चमक होती थी. उन्हें लगता था बेटी विलायत से पढ़कर आयी है, अब तो सारी समस्याएं खत्म कर देगी. किसी का राशन कार्ड बनना है तो किसी को किसी सरकारी योजना का लाभ लेना है. हर कोई इल्मा के पास आस लेकर आता था. इल्मा को भी लगा की यूपीएससी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके द्वारा वे अपना देश सेवा का सपना साकार कर सकती हैं.

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मां और भाई के सहयोग से मिली मंजिल –

इल्मा पढ़ाई में हमेशा से आगे थी और इरादे की पक्की. इसके साथ ही उन्हें अपनी मां और भाई का सहयोग हमेशा मिला. आखिरकार इल्मा ने साल 2017 में 217वीं रैंक के साथ 26 साल की उम्र में यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली. जब सर्विस चुनने की बारी आयी तो उन्होंने आईपीएस चुना. बोर्ड ने पूछा भारतीय विदेश सेवा क्यों नहीं तो इल्मा बोली, नहीं सर मुझे अपनी जड़ों को सींचना है, अपने देश के लिये ही काम करना है.

इल्मा की कहानी यह बताती है कि जमीन से जुड़े रहना कितना जरूरी है. जमीन से जुड़ें रहकर निगाह लक्ष्य पर रखें. इल्मा ने कभी अपनी सफलता को सिर पर नहीं चढ़ने दिया. न ही इस सफलता की राह में मिले लोगों के सहयोग को ऊंचाई पर पहुंकर भुलाया. बल्कि इस संघर्ष में जो भी उनके साथी बने थे सबका शुक्रिया अदा किया और मौका आने पर अपना योगदान देने में कभी पीछे नहीं हटी.

 

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